जब सबने साथ छोड़ दिया, तब मुझे जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई समझ आई

लेखक के बारे में

लेखक: शिवम सोनी

स्थान: उरई, जालौन, उत्तर प्रदेश, भारत

अंतिम अपडेट: 1 जून 2026

शिवम सोनी News Shivam90 और Shivam90.in के संस्थापक हैं। वे जीवन के अनुभव, प्रेरणादायक विषयों, सामाजिक मुद्दों, व्यापार, बाजार विश्लेषण और वास्तविक घटनाओं पर आधारित लेख लिखते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल भाषा में ऐसी जानकारी पहुंचाना है जो उन्हें सोचने, सीखने और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे।

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों, जीवन में आए संघर्षों और उनसे मिली सीख पर आधारित है। लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने अनुभव और दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

Image Caption: जब जीवन के कठिन समय में सब साथ छोड़ दें, तब इंसान को अपने भीतर छिपी ताकत, विश्वास और नई उम्मीद का रास्ता खोजने की जरूरत होती है।

जब सबने साथ छोड़ दिया, तब मुझे जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई समझ आई।

जीवन में कुछ ऐसे पल आते हैं जब इंसान चारों तरफ से घिरा हुआ महसूस करता है। न कोई रास्ता दिखाई देता है, न कोई उम्मीद। जिन लोगों पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है, कई बार वही लोग दूर हो जाते हैं। उस समय दुख सिर्फ परिस्थितियों का नहीं होता, बल्कि टूटे हुए विश्वास का भी होता है।

मैंने भी जीवन में ऐसा समय देखा है जब हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता था। मन में हजारों सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं थे। उसी कठिन समय ने मुझे सिखाया कि जिंदगी की असली ताकत बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपी होती है।

आज मैं अपने अनुभव से सीखी हुई कुछ ऐसी बातें साझा करना चाहता हूं, जिन्होंने मुझे सबसे मुश्किल दिनों में भी आगे बढ़ने की हिम्मत दी। 

हालांकि मेरी जिंदगी आज भी उन्हीं परिस्थितियों में उलझी हुई है। फर्क सिर्फ इतना है कि जब यह सब शुरू हुआ था और आज के समय में बहुत अंतर आ चुका है। पहले घबराहट, बेचैनी और मानसिक तनाव ने मेरे भीतर एक अलग ही दुनिया बना दी थी। ऐसा लगता था जैसे हर तरफ अंधेरा है और कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। लेकिन आज, समस्याएं अभी भी मौजूद हैं, परिस्थितियां अभी भी वैसी ही हैं, उन्होंने अपना प्रभाव भी बनाए रखा है, फिर भी शायद मेरा मन और दिमाग यह पहचान चुका है कि अब इन्हीं परिस्थितियों के साथ आगे जीवन जीना है।

कुछ परिस्थितियों का अंत हम स्वयं नहीं कर सकते। कई बार उनका परिणाम दूसरे लोगों के निर्णय, सोच और समझ पर भी निर्भर करता है। ऐसे समय में इंसान चाहे जितनी कोशिश कर ले, उसके सामने अक्सर दो ही रास्ते बचते हैं। पहला, यदि गुंजाइश हो तो समझौता कर लिया जाए। दूसरा, उन परिस्थितियों के साथ जीना सीख लिया जाए।

यहीं से एक ऐसी कहानी शुरू होती है जो आपको आपके भविष्य की एक झलक दिखा देती है। जीवन आगे कैसा जाएगा, इसका अंदाजा इन्हीं संघर्षों के बीच लगने लगता है।

कई बार जीवन इतना अजीब लगने लगता है कि इंसान को महसूस होता है जैसे उसके हाथ में कुछ भी नहीं है। भविष्य की चिंता में उलझा हुआ दिमाग रातों को सोने नहीं देता। हर दिन एक नया सवाल लेकर आता है और हर रात उन्हीं सवालों के साथ बीत जाती है।

इस दौर में मैंने एक बात सीखी। पहले मैं खुद को संभालने के लिए अक्सर यह सोच लिया करता था कि "होगा वहीं जो राम ने लिख दिया।" यह वाक्य सुनने में बहुत सरल और सुकून देने वाला लगता है। लेकिन जब लगभग दो वर्षों बाद मुझे इसका गहरा अर्थ समझ आया, तो मैं भीतर तक हिल गया।

मुझे एहसास हुआ कि अधूरा ज्ञान कई बार विनाश का कारण भी बन सकता है। मेरी सबसे बड़ी गलती शायद यही थी कि मैंने इस वाक्य को आधा समझा था। बाद में जब सत्य को समझा, तब महसूस हुआ कि इंसान को शुरुआत में यह नहीं मान लेना चाहिए कि "होगा वहीं जो राम ने लिख दिया"। पहले इंसान को अपनी ओर से हर संभव प्रयास करना चाहिए। अपनी पूरी शक्ति, पूरी बुद्धि और पूरी ईमानदारी से संघर्ष करना चाहिए। जब सभी प्रयास समाप्त हो जाएं, तब यह स्वीकार करना चाहिए कि "अब होगा वहीं जो राम ने लिख दिया।"

इसके पीछे एक कथा भी है। भगवान शिव माता सती को बार-बार समझा रहे थे कि जो वन-वन भटक रहे हैं, वही भगवान राम त्रिलोकीनाथ हैं। लेकिन माता सती के मन में संदेह था। उनके मन में प्रश्न था कि यदि राम त्रिलोकीनाथ हैं तो वे वन, पशु-पक्षियों और वृक्षों से माता सीता का पता क्यों पूछ रहे हैं। संदेह के कारण माता सती परीक्षा लेने पहुंच गईं।

भगवान शिव अपनी ओर से हर संभव प्रयास कर चुके थे। उन्होंने समझाया, चेताया, मार्ग दिखाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि अब उनके प्रयासों की सीमा समाप्त हो चुकी है, तब उन्होंने कहा — "होगा वहीं जो राम ने लिख दिया।"

इस प्रसंग ने मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी। आज भी मैं सोचता हूं कि यदि मैंने समय रहते अपनी ओर से और अधिक प्रयास किए होते, तो शायद जीवन में आया यह भूकंप टल सकता था। शायद जिंदगी आज इस मुकाम पर न होती।

आज स्थिति यह है कि ऐसा महसूस होता है जैसे खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं। मकान बिक गया, व्यापार समाप्त हो गया, शरीर और मन दोनों थक चुके हैं। कभी-कभी लगता है कि जीवन ने मुझे उस जगह लाकर खड़ा कर दिया है जहां हार और संघर्ष के बीच का अंतर भी मिट जाता है।

विश्वास टूटे, व्यापारियों का भरोसा कम हुआ, आर्थिक मजबूरियां बढ़ीं और हालात ऐसे बने कि एक-एक रुपये की कीमत समझ आने लगी। सबसे ज्यादा दर्द तब होता है जब अपने परिवार की आंखों में बेचैनी दिखाई देती है। मां-बाप की चिंता, भाई-बहनों की उम्मीदें और जिम्मेदारियों का भार इंसान को पीछे हटने नहीं देता।

इसीलिए कई बार मुझे लगता है कि मैं रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहा हूं। शरीर जिंदा है, लेकिन भीतर का एक हिस्सा हर दिन टूटता है। इस पीड़ा को शायद कोई नाम नहीं दिया जा सकता। यह केवल वही समझ सकता है जिसने लंबे समय तक संघर्ष के साथ जीना सीखा हो।

लेकिन इसी अंधेरे में मुझे एक ऐसी बात समझ आई जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना मुश्किल है।

"मां की ममता इस संसार की सबसे दुर्लभ और सबसे बड़ी शक्ति है।"


जब दुनिया उम्मीद छोड़ देती है, जब रिश्ते कमजोर पड़ने लगते हैं, जब इंसान स्वयं अपने ऊपर से विश्वास खोने लगता है, तब भी मां का विश्वास अक्सर बना रहता है। शायद इसी कारण सबसे कठिन समय में भी इंसान पूरी तरह नहीं टूटता। उसके पास लौटने के लिए कुछ रास्ते होते हैं। पहला रास्ता घर में बैठी मां होती है, जो शायद जिंदगी को हमसे अलग नजरिए से देखती है।

मैंने अपने अनुभव में पाया कि मां के पास लगभग हर मुसीबत का कोई न कोई हल होता है। अगर नाम देना हो तो मैं कह सकता हूं कि हर परिस्थिति को समझने और भीतर से मजबूत बने रहने की एक अद्भुत शक्ति मां के पास होती है। कई बार मुझे लगता है कि यही शक्ति भद्रकाली के स्वरूप जैसी होती है।

मैंने यह भी पाया कि मां को परिवार को सुरक्षित रखने की एक आदत सी हो जाती है। यह एक दुर्लभ भाव है। मां अपने दर्द को छिपा सकती है, अपनी इच्छाओं को दबा सकती है, लेकिन परिवार पर संकट देखना उसके लिए सबसे कठिन होता है। मैंने देखा है कि अगर मां को समय न दिया जाए, उसकी बात न सुनी जाए, तो वह रो भी पड़ती है, गुस्सा भी करती है और शिकायत भी करती है।

यहीं से मुझे एक और बात समझ आई। चाहे देवता हों, देवी हों या कोई ऐसा व्यक्ति जो हमसे सच्चा प्रेम करता हो, अगर हम उसकी आदत बन जाते हैं और वह हमारी आदत बन जाता है, तो उसे समय देना हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।

शायद यही गलती मुझसे भी हुई।

पहले मैं अपनी कुलदेवी की नियमित पूजा किया करता था। हर दिन उनके सामने बैठना, प्रार्थना करना और मन की बात कहना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन धीरे-धीरे जीवन की भागदौड़, समस्याओं और तनाव के बीच पूजा पूरी तरह छूट गई।

बाद में जब मैंने अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखा, तो मुझे लगा कि शायद मैंने अपनी मां और अपनी कुलदेवी दोनों को कहीं न कहीं नाराज कर दिया था। यह केवल धार्मिक भावना नहीं थी, बल्कि एक आत्ममंथन था। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैं अपनी समस्याओं में इतना उलझ गया कि उन रिश्तों को समय देना ही भूल गया जिन्होंने हमेशा मुझे संभाला था।

उस समय मेरे मन में यह विचार भी आया कि शायद मुसीबत के समय मुझे ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि मैंने उन शक्तियों से दूरी बना ली थी जो हमेशा मेरे साथ खड़ी थीं।

एक घटना ने मुझे मेरी गलती का एहसास और गहरा कर दिया। यह अनुभव मैं आपके साथ भी साझा करना चाहता हूं।

इन विपरीत परिस्थितियों के बीच मैं माता रानी के दरबार में जाने लगा। हर सोमवार स्नान करके, बिना कुछ खाए, आधा दिन व्रत रखकर वहां जाता था। वहां एक महिला हैं जिन्हें माता भद्रकाली की साधना प्राप्त है। लोग उन्हें श्रद्धा से देखते हैं। वह पूर्ण श्रृंगार के साथ माता की पूजा करती हैं। मैंने कई बार वहां ऐसा वातावरण महसूस किया जो सामान्य नहीं था।

एक दिन मैंने देखा कि वह रो रही थीं। उस दिन का दृश्य आज भी मेरे मन में वैसा ही है। मैं भी उनके सामने बैठा था। उन्होंने रोते हुए कहा — "तुम्हारे पास आने का समय नहीं है।"

उनकी यह बात सुनकर मेरा मन भीतर तक हिल गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया हो। मैं भी रो पड़ा।

उस दुर्लभ क्षण ने मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती का एहसास कराया। मैं अपनी समस्याओं में इतना डूब गया था कि जिनसे मुझे शक्ति मिलती थी, उन्हें ही समय देना छोड़ दिया। मैं अपनी तकलीफों के बारे में सोचता रहा, लेकिन यह नहीं सोच पाया कि मैंने पूजा क्यों छोड़ दी, प्रार्थना क्यों छोड़ दी और उन संबंधों को क्यों कमजोर होने दिया जो मुझे संभालते थे।

उस दिन मुझे ऐसा महसूस हुआ कि शायद सच्चे प्रेम की कदर मैं समय रहते नहीं कर पाया। चाहे वह मां का प्रेम हो, कुलदेवी का आशीर्वाद हो या वह शक्ति जो कठिन समय में हमें टूटने से बचाती है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि जीवन की सबसे बड़ी गलतियां हमेशा बड़े निर्णयों में नहीं होतीं। कई बार हम उन लोगों और उन भावनाओं को समय देना छोड़ देते हैं जो हमारी सबसे बड़ी ताकत होती हैं। बाद में जब उनकी कमी महसूस होती है, तब समझ आता है कि सच्चे प्रेम और सच्चे साथ की कीमत क्या होती है।


जीवन की कुछ गलतियां तुरंत दिखाई नहीं देतीं, लेकिन जब उनका परिणाम सामने आता है तो पूरा जीवन बदल जाता है। कुछ रिश्ते हमें खुशियां देते हैं, कुछ रिश्ते हमें ऐसी सीख दे जाते हैं जिनकी कीमत वर्षों तक चुकानी पड़ती है।

जीवन के कुछ रिश्तों में आपको दर्द भी मिलता है। कई बार इसका कारण सामने वाला नहीं, बल्कि हम स्वयं होते हैं। धीरे-धीरे परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि जीवन अंधकार में जाता हुआ महसूस होने लगता है।

अब बात एक ऐसी अनसुलझी कहानी की करता हूं जिसने मुझे जीवन की सबसे कठिन सीखों में से एक दी। शादी जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां लिया गया एक गलत निर्णय कई बार पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है।

मेरा अनुभव कहता है कि इस मोड़ पर इंसान को अपने पुराने अनुभवों, पुरानी सीखों और बचपन से मिली शिक्षाओं का पुनर्मंथन अवश्य करना चाहिए। शादी के बाद इंसान जिम्मेदार तो हो जाता है, लेकिन साथ ही गलतियों का पात्र भी बन जाता है।

यहां दो प्रमुख पक्ष होते हैं — पहला पत्नी और दूसरा परिवार। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना जितना आसान दिखाई देता है, वास्तविक जीवन में उतना ही कठिन होता है।

मैं भी इसी मंथन में उलझ गया। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस समय मैं इतना अनुभवी नहीं था कि इस मंथन से निकलने वाले विष को संभाल पाता।

बाद में समझ आया कि मंथन केवल मेरा नहीं था। मंथन उस आवश्यकता का था जो मैं दोनों पक्षों के लिए था। एक ओर पत्नी की अपेक्षाएं थीं, दूसरी ओर परिवार की जिम्मेदारियां। मैं दोनों के बीच ऐसा उलझा कि जीवन का संतुलन ही बिगड़ गया।

धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी जटिल होती गईं कि मामला कोर्ट, पुलिस, कानूनी प्रक्रियाओं, पारिवारिक तनाव, जिम्मेदारियों, खर्चों, बिजली के बिलों, ईएमआई और भविष्य की अनिश्चितताओं तक पहुंच गया।

कई बार मैं सोचता हूं कि यह सब उस व्यक्ति के साथ हो रहा था जिसकी उम्र अभी महज 29 वर्ष थी और जो अभी जीवन को समझने की प्रक्रिया में ही था।

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव तब हुआ जब रिश्ता बिखरने लगा। उस समय जो सत्य मेरे सामने आया, उसने मुझे भीतर तक हिला दिया।

आज मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि गलती मेरी भी थी। मेरी सबसे बड़ी गलतियों में से एक था — पूर्ण समर्पण।

मैं अपनी पत्नी से कोई बात नहीं छिपाता था। जो सोचता था, वही कहता था। जो परिस्थिति होती थी, उसे पूरी सच्चाई के साथ साझा करता था। मैंने हमेशा यही सुना था कि "पत्नी और सलाहकार से सत्य नहीं छिपाना चाहिए।"

लेकिन बाद में मैंने जीवन का दूसरा पक्ष भी देखा। मैंने पाया कि हर सत्य हर परिस्थिति में समान परिणाम नहीं देता।

जब रिश्तों में विश्वास बना रहता है तो सत्य संबंधों को मजबूत करता है। लेकिन जब संबंध टूटने लगते हैं, तब वही सत्य कई बार हथियार भी बन सकता है।

मैंने अनुभव किया कि इंसान की कमजोरियां, उसकी निजी बातें, उसकी चिंताएं और उसका पूर्ण विश्वास, गलत परिस्थितियों में उसके विरुद्ध भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

तब मुझे एक और गहरी बात समझ आई।

जिस प्रकार किसी व्यक्ति के साथ सबसे बड़ा धोखा तब होता है जब उसकी महत्वपूर्ण जानकारी गलत हाथों में चली जाए, उसी प्रकार रिश्तों में भी बिना संतुलन के किया गया पूर्ण समर्पण कई बार इंसान को असुरक्षित बना सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि रिश्तों में झूठ होना चाहिए। इसका अर्थ केवल इतना है कि प्रेम, विश्वास और समर्पण के साथ-साथ विवेक और संतुलन भी आवश्यक है।

आज अपने अनुभव से मैं इतना अवश्य कह सकता हूं कि किसी भी रिश्ते में स्वयं को पूरी तरह समाप्त कर देना प्रेम नहीं है। प्रेम में समर्पण होना चाहिए, लेकिन समर्पण में स्वयं का अस्तित्व, आत्मसम्मान और विवेक भी सुरक्षित रहना चाहिए।

शायद यही वह सीख है जिसे मैं बहुत देर से समझ पाया।

"हर रिश्ते में विश्वास जरूरी है, लेकिन बिना विवेक के किया गया पूर्ण खुलापन कई बार स्वयं को असुरक्षित बना देता है।"