🇮🇳 बंदे मातरम: वो नारा जिसने भारत को आज़ाद करवाया
नई दिल्ली: “बंदे मातरम” — ये दो शब्द सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि एक मंत्र है जब भी भारत पर कोई भी आंख उठाता है तो अपने आप ही हर भारत के जन से बंदे मातरम की गूंज सुनाई देती है भारत माता के चरणों में समर्पित वो भावना हैं बंदे मातरम जिसने अंग्रेज़ों की नींद हराम कर दी थी। जब-जब भारत की धरती पर अत्याचार बढ़े, तब-तब ये नारा लोगों की रगों में आग बनकर दौड़ा।
👉 बंदे मातरम की कहानी
साल 1870 के आसपास बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास आनंदमठ लिखा। इसी में ‘वंदे मातरम्’ गीत था — जिसे बाद में रवींद्रनाथ टैगोर ने संगीत दिया और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाया गया।
“बंदे मातरम” का अर्थ है — “मां, तुझे प्रणाम”। यह गीत भारत को एक मां के रूप में देखता है, जिसकी मिट्टी, जल, पर्वत और आकाश सब पूजनीय हैं।
🔥 क्रांतिकारियों का युद्धघोष
भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, बिपिन चंद्र पाल, और सुभाष चंद्र बोस जैसे वीरों की जुबान पर जब “वंदे मातरम” गूंजता था, तो अंग्रेज़ भी कांप उठते थे। यह गीत आज़ादी के आंदोलन का प्रतीक बन गया था।
“वंदे मातरम्” ने वो हौसला दिया जिससे एक गुलाम देश ने अपनी जंजीरें तोड़ दीं।
🎵 बंदे मातरम का स्वरूप
गीत के पहले दो पदों को भारत का राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया है। जबकि “जन गण मन” हमारा राष्ट्रीय गान है। दोनों का स्थान समान रूप से सम्माननीय है।
🌕 आज के भारत में बंदे मातरम का महत्व
आज जब देश तरक्की की राह पर है, तब भी “वंदे मातरम्” हमें याद दिलाता है कि असली भारत मां के चरणों में सेवा है — न कि नफ़रत में।
हर स्कूल, हर मैदान, और हर दिल में जब ये नारा गूंजता है — “वंदे मातरम्!” — तो करोड़ों भारतीयों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
📜 निष्कर्ष
“बंदे मातरम” कोई गीत नहीं — वो भावना है जिसने हर भारतीय को अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण सिखाया। आज भी जब भारत मां की जय होती है, तो कहीं न कहीं बंकिम बाबू की आत्मा मुस्कुरा उठती होगी — “वंदे मातरम्!” 🇮🇳
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