तालिबान विदेश मंत्री को दिल्ली बुलाकर आखिर क्या पाना चाहता है भारत? जिससे दहशत में चीन-PAK
नई दिल्ली: भारत ने अचानक अफगानिस्तान के तालिबान शासन के विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्तकी को बातचीत के लिए भारत की राजधानी दिल्ली बुला लिया है। इस कदम से न सिर्फ चीन और पाकिस्तान में बेचैनी बढ़ी है, बल्कि कई देशों की नींद उड़ गई है यह भारत की नई कूटनीतिक चाल मानी जा रही है। क्योंकि अफगानिस्तान पर भारत की पकड़ मजबूत करने की ये कोशिश सीधी उनके हितों को चुनौती दे रही है। सवाल उठता है — आखिर भारत क्या हासिल करना चाहता है-सुरक्षा, निवेश या अफगान राजनीति में नई भूमिका?
🔹 भारत की रणनीति: बातचीत से सुरक्षा और प्रभाव दोनों
तालिबान सरकार को अब तक भारत ने औपचारिक मान्यता नहीं दी, लेकिन मानवीय और सुरक्षा मुद्दों पर भारत ने तालिबान से संपर्क बनाए रखा है। सूत्रों के अनुसार लगता है कि, भारत चाहता है कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान-समर्थित आतंकी समूह भारत के खिलाफ न करें।
🔹 चीन-पाकिस्तान की टेंशन क्यों बढ़ी?
चीन और पाकिस्तान, दोनों ही अफगानिस्तान में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। चीन वहां खनिज संपदा (Lithium और Copper) पर नज़र गड़ाए है, जबकि पाकिस्तान तालिबान को “अपने रणनीतिक गहराई” के रूप में देखता है। ऐसे में भारत का तालिबान से सीधा संपर्क उनकी योजनाओं को झटका दे रहा है।
🔹 तालिबान भी भारत से क्यों जुड़ना चाहता है?
अफगानिस्तान में आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बीच तालिबान चाहता है कि भारत उसके साथ मानवीय, व्यापारिक और शैक्षणिक सहयोग फिर से शुरू करे जो तालिबान की सबसे बड़ी जरूरत है। भारत ने पहले भी वहां स्कूल, सड़कें और बिजली परियोजनाएं बनाई थीं।
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🔹 चीन-पाकिस्तान में बढ़ी हलचल
भारतीय आमंत्रण की खबर मिलते ही बीजिंग और इस्लामाबाद में कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान को डर है कि अगर भारत और तालिबान के बीच रिश्ते सुधरते हैं, तो उसका अफगानिस्तान पर प्रभाव घट जाएगा। इससे पाकिस्तान की रीढ़ की हड्डी पर कह सकते है।
🔹 भारत की नीयत साफ़ — “अफगानिस्तान को संतुलित रखना”
भारत की कोशिश है कि अफगानिस्तान में ऐसा माहौल बने जहां चीन और पाकिस्तान को एकतरफा फायदा न हो। साथ ही भारत अपनी सुरक्षा और दक्षिण एशिया में प्रभाव दोनों बनाए रख सके।
🔹 निचोड़
भारत का तालिबान विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्तकी को दिल्ली बुलाना सिर्फ एक मीटिंग नहीं — ये एक कूटनीतिक संकेत है कि अब एशिया में भारत की भूमिका बिना उसकी अनुमति के तय नहीं हो सकती।
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