
अमावस्या की सुबह सिर्फ एक धार्मिक तिथि नहीं लेकर आई, बल्कि करोड़ों सुहागन महिलाओं की आस्था, विश्वास और अखंड सौभाग्य की कामना का सबसे बड़ा पर्व भी साथ लाई है। देशभर में आज वट सावित्री व्रत पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ रखा जा रहा है। मंदिरों में सुबह से घंटियों की आवाज गूंज रही है, बरगद के पेड़ों के नीचे पूजा की तैयारियां दिखाई दे रही हैं और महिलाएं 16 श्रृंगार कर अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना कर रही हैं।
इस बार का वट सावित्री व्रत इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि इसी दिन शनि जयंती का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक इस बार कई शुभ योग एक साथ बन रहे हैं, जिनका प्रभाव व्रत और पूजा के महत्व को और भी बढ़ा रहा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि माता सावित्री ने इसी दिन अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
मान्यता है कि महिलाएं श्रद्धा और नियमों के साथ यह व्रत रखती हैं तो उनके वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
16 मई 2026 यानी शनिवार के दिन वट सावित्री व्रत मनाया जा रहा है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि सुबह 5:11 बजे से शुरू होकर अगले दिन 17 मई को रात 1:30 बजे तक रहेगी।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार पूजा का सबसे शुभ समय सुबह 7:12 बजे से 8:24 बजे तक रहेगा। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा। वहीं ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:07 बजे से 4:48 बजे तक है। विजय मुहूर्त दोपहर 2:04 बजे से 3:38 बजे तक और गोधूलि मुहूर्त शाम 7:04 बजे से 7:25 बजे तक रहेगा।
इस बार वट सावित्री व्रत के दिन शनि जयंती का विशेष संयोग बन रहा है। इसके साथ ही बुधादित्य योग, गज लक्ष्मी योग, नवपंचम योग और विपरीत राजयोग जैसे कई शुभ योग भी बन रहे हैं। धार्मिक दृष्टि से यह बेहद शुभ माना जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से पति की आयु बढ़ती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
व्रत के नियमों की बात करें तो इस दिन महिलाएं प्रातः स्नान कर साफ और शुभ रंग के वस्त्र धारण करती हैं। लाल, पीला और गुलाबी रंग को इस दिन विशेष शुभ माना जाता है। कई महिलाएं 16 श्रृंगार भी करती हैं, जिसमें सिंदूर, चूड़ी, बिंदी, मेहंदी और महावर का खास महत्व होता है।
इसके बाद महिलाएं पूजा की थाली सजाकर वट वृक्ष के पास पहुंचती हैं। पूजा के दौरान धूप, दीप, फूल, रोली, अक्षत और जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद कच्चा सूत या कलावा लेकर पेड़ के चारों ओर परिक्रमा की जाती है।
धार्मिक ग्रंथों में वट सावित्री कथा सुनना या पढ़ना अनिवार्य माना गया है। मान्यता है कि बिना कथा सुने व्रत अधूरा माना जाता है।
पूजा सामग्री में कच्चा सूत, बांस का पंखा, रक्षासूत्र, पान के पत्ते, श्रृंगार का सामान, भीगे हुए काले चने, नारियल, बताशा, फल, धूप, दीपक, अगरबत्ती, पूजा थाली, सिंदूर, रोली, अक्षत, कुमकुम, चंदन, सुपारी, फूल और जल का कलश शामिल किया जाता है। कई महिलाएं सात प्रकार के अनाज और वट वृक्ष की छोटी शाखा की पूजा भी करती हैं।
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